Monday, August 30, 2010

कभी अक्स दिखा आएने में
छुते ही शीशा टूट गया
कुछ अरमान बसे थे ख्यालों में
कहते ही रंग बेरंग हुआ॥

तू दूर इतना चला गया
अम्बर भी पास लगता है
रोती थी आँखें कभी तुझे जाता देख
अब इंतज़ार ही कहाँ रहता है॥

महसूस होता था कभी आहों में
अब चेहरा भी धूमिल दिखता है
मह्फूस था कभी यादों में
अब अफसाना बन के जीता है॥

हर पन्ना महकता था कभी
अब धुल में बिखरा मिलता है
लिखते थे कहानी हम भी कभी
अब अक्षर रूठा रहता है॥

बेसब्र थी कभी ये रूह
अब निस्तब्ध सन्नाटा रहता है
तोड़ दूं इस बंजर रिश्ते को
पर तुझ बिन जीने से डर लगता है॥