कभी अक्स दिखा आएने में
छुते ही शीशा टूट गया
कुछ अरमान बसे थे ख्यालों में
कहते ही रंग बेरंग हुआ॥
तू दूर इतना चला गया
अम्बर भी पास लगता है
रोती थी आँखें कभी तुझे जाता देख
अब इंतज़ार ही कहाँ रहता है॥
महसूस होता था कभी आहों में
अब चेहरा भी धूमिल दिखता है
मह्फूस था कभी यादों में
अब अफसाना बन के जीता है॥
हर पन्ना महकता था कभी
अब धुल में बिखरा मिलता है
लिखते थे कहानी हम भी कभी
अब अक्षर रूठा रहता है॥
बेसब्र थी कभी ये रूह
अब निस्तब्ध सन्नाटा रहता है
तोड़ दूं इस बंजर रिश्ते को
पर तुझ बिन जीने से डर लगता है॥
Monday, August 30, 2010
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